देहरादून। कहते हैं कि मंज़िल उन्हीं को मिलती है, जिनके सपनों में जान होती है, पंख से कुछ नहीं होता, हौसलों में उड़ान होती है। इसी कहावत को सच कर दिखाया है पौड़ी गढ़वाल के मेरुड़ा गांव की बेटी अंकिता ध्यानी ने, जो साधारण किसान-मजदूर परिवार से निकलकर राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय खेल मंचों पर अपनी प्रतिभा का लोहा मनवा रही हैं।अंकिता ध्यानी किसान पिता महिमा नंद ध्यानी और गृहिणी मां लक्ष्मी देवी की बेटी हैं। गांव की सादगीभरी जिंदगी और सीमित संसाधनों के बावजूद अंकिता ने कभी हार नहीं मानी। साल 2017 में उनका दाखिला रुद्रप्रयाग स्थित अगस्तमुनि एथलेटिक्स हॉस्टल में हुआ। वहीं से उन्होंने पढ़ाई के साथ-साथ खेल की दिशा में भी कदम बढ़ाया। आर्थिक स्थिति मजबूत न होने के कारण वे महंगे खेलों की ओर नहीं जा सकीं, लेकिन उन्होंने हार न मानते हुए स्टीपल-चेज़ को अपनी मंजिल बनाया और कड़ी मेहनत से इसमें महारत हासिल करने का संकल्प लिया।अंकिता रोज़ाना छह-छह घंटे तक अभ्यास करती रहीं। उनकी मेहनत रंग लाई और उन्होंने जिला तथा राज्य स्तर की प्रतियोगिताओं में एक के बाद एक पदक जीतना शुरू किया। हालांकि खेल के साथ-साथ उन्होंने शिक्षा से नाता नहीं तोड़ा और इग्नू से स्नातक की पढ़ाई भी जारी रखी।उनकी असली पहचान तब बनी जब 2023 में हुई एशियन एथलेटिक्स चैंपियनशिप में उन्होंने शानदार प्रदर्शन कर कांस्य पदक जीता। इस उपलब्धि के बाद से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उनका नाम गूंजने लगा और वे उत्तराखंड की बेटियों के लिए प्रेरणा स्रोत बन गईं।आज अंकिता ध्यानी यह साबित कर रही हैं कि अगर हौसले बुलंद हों तो सीमित संसाधन भी सपनों की उड़ान को रोक नहीं सकते।
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