नैनीताल — उत्तराखंड हाईकोर्ट ने पॉक्सो (POCSO) से जुड़े एक मामले में निचली अदालत के फैसले पर सख्त नाराजगी जताते हुए आरोपी को जमानत पर रिहा करने का आदेश दिया है। अदालत ने कहा कि निचली अदालत ने बिना किसी प्रत्यक्ष सबूत और गवाही के आरोपी को दोषी ठहराया, जो न्याय के बुनियादी सिद्धांतों के विपरीत है।मामला उस समय चर्चाओं में आया जब मुख्य न्यायाधीश जी. नरेंद्र और न्यायमूर्ति आलोक माहरा की खंडपीठ ने आरोपी रामपाल द्वारा दायर अपील पर सुनवाई की। पीठ ने निचली अदालत के निर्णय को “आश्चर्यजनक और न्यायिक विवेक के विपरीत” बताया। अदालत ने स्पष्ट शब्दों में टिप्पणी की कि यह “अपर्याप्त सबूत का नहीं, बल्कि सबूत न होने का मामला है।”हाईकोर्ट ने कहा कि मामले में न तो किसी प्रत्यक्षदर्शी की गवाही हुई और न ही कोई ठोस साक्ष्य प्रस्तुत किए गए, बावजूद इसके अधीनस्थ न्यायालय ने आरोपी को दोषी ठहरा दिया। इससे भी अधिक चौंकाने वाली बात यह थी कि पीड़िता ने अपनी गवाही में खुद यह कहा कि आरोपी ने उसके साथ किसी भी प्रकार का शारीरिक संबंध नहीं बनाया, इसके बावजूद उसे दोषी ठहराया गया।खंडपीठ ने टिप्पणी की कि इस प्रकार के निर्णय न्यायिक प्रणाली की गंभीरता पर सवाल खड़े करते हैं। अदालत ने कहा कि जब गवाही, सबूत या प्रत्यक्ष साक्ष्य ही नहीं हैं, तो किसी व्यक्ति को सजा देना कानून के मूल सिद्धांतों का घोर उल्लंघन है।हाईकोर्ट ने आदेश दिया कि आरोपी रामपाल को तुरंत जमानत पर रिहा किया जाए, साथ ही निचली अदालत के निर्णय की प्रतियां राज्य सरकार और संबंधित न्यायिक अधिकारियों को भेजने के निर्देश दिए, ताकि इस तरह की न्यायिक त्रुटि दोबारा न हो।इस फैसले ने एक बार फिर न्यायपालिका में साक्ष्य और निष्पक्षता के महत्व को रेखांकित किया है। अदालत ने कहा कि किसी भी यौन अपराध से संबंधित मामला अत्यंत संवेदनशील होता है, लेकिन संवेदनशीलता के नाम पर न्यायिक विवेक का हनन नहीं किया जा सकता।
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