बनभूलपुरा अतिक्रमण मामले में सुप्रीम कोर्ट में आज जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जयमाला बागची की खंडपीठ के समक्ष लंबी सुनवाई हुई, जहां अबदुल मतीन सिद्दीकी द्वारा दायर लीव टू अपील के तहत हाईकोर्ट के उस आदेश को चुनौती दी गई थी जिसमें बलभूलपुरा क्षेत्र से अतिक्रमण हटाने के निर्देश दिए गए थे। सुनवाई के दौरान रेलवे, राज्य सरकार और कब्जेदारों की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ताओं ने विस्तार से अपनी दलीलें रखीं। रेलवे की तरफ से वरिष्ठ अधिवक्ता ऐश्वर्या भाटी ने अदालत को बताया कि रेल सेवाओं के विस्तार, ट्रैक निर्माण और विकसित हो रहे रेल इंफ्रास्ट्रक्चर के लिए कुल 30 हेक्टेयर जमीन की तत्काल आवश्यकता है तथा इस भूमि पर वर्षों से चले आ रहे अतिक्रमण को हटाकर जल्द से जल्द रेलवे को सौंपा जाना अनिवार्य है, इसलिए न्यायालय को हस्तक्षेप करना चाहिए। राज्य सरकार की ओर से अभिषेक अत्रे ने मामला रखते हुए हाईकोर्ट के निर्णय का समर्थन किया और कहा कि विस्तार के लिए आवश्यक प्रशासनिक कार्रवाई जारी है। वहीं दूसरी तरफ कब्जेदारों का पक्ष रखते हुए वरिष्ठ अधिवक्ता सलमान खुर्शीद, प्रशांत भूषण और अन्य अधिवक्ताओं ने अदालत के समक्ष तर्क दिया कि रेलवे द्वारा मांगी गई अतिरिक्त भूमि उसके पूर्व लिखित दावों में शामिल नहीं थी और रिटेनिंग वॉल के निर्माण के बाद रेलवे के किसी भी ढांचे या सुरक्षा को कोई खतरा शेष नहीं रहा है, इसलिए अतिक्रमण हटाने का निर्णय जल्दबाज़ी में लिया गया प्रतीत होता है। इसके साथ ही उन्होंने प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत बनभूलपुरा के निवासियों को स्थानांतरित करने के प्रशासनिक प्रस्ताव का विरोध करते हुए इसे अनुचित, अव्यवहारिक और प्रभावित परिवारों के साथ अन्याय बताया, जिसके तुरंत बाद रेलवे के वकीलों ने इस पर आपत्ति जताते हुए कहा कि पुनर्वास का मुद्दा मूल भूमि आवश्यकता से अलग रखा जाना चाहिए। दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद अदालत ने सभी पक्षों से अतिरिक्त दस्तावेज और स्पष्टीकरण मांगे तथा अगली सुनवाई में विस्तृत विचार करने के संकेत दिए, जिससे यह मामला एक बार फिर अत्यधिक संवेदनशील और महत्वपूर्ण चरण में पहुंच गया है।
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