देहरादून।प्रदेश में संचालित अल्पसंख्यक शैक्षिक संस्थानों को एक समान और सुदृढ़ ढांचे में लाने की दिशा में उत्तराखंड सरकार ने बड़ा कदम उठाया है। उत्तराखंड अल्पसंख्यक शिक्षा अधिनियम के तहत राज्य सरकार ने उत्तराखंड राज्य अल्पसंख्यक शिक्षा प्राधिकरण का गठन कर दिया है। इसके गठन के साथ ही प्रदेश में अल्पसंख्यक शिक्षा व्यवस्था एक नई दिशा में आगे बढ़ेगी।अब राज्य में मुस्लिम, सिख, ईसाई, बौद्ध, जैन और पारसी समुदायों द्वारा संचालित सभी शैक्षिक संस्थान इस प्राधिकरण के दायरे में आएंगे। सरकार का उद्देश्य इन सभी संस्थानों को एक छत के नीचे लाकर शिक्षा की गुणवत्ता, पारदर्शिता और समान अवसर सुनिश्चित करना है।सरकारी निर्णय के अनुसार एक जुलाई से उत्तराखंड मदरसा शिक्षा बोर्ड का अस्तित्व समाप्त हो जाएगा। इसके साथ ही बोर्ड के अधीन संचालित 452 मदरसे भी स्वतः राज्य अल्पसंख्यक शिक्षा प्राधिकरण के अंतर्गत आ जाएंगे। इससे पहले मदरसा शिक्षा एक अलग व्यवस्था के तहत संचालित होती थी, लेकिन अब इसे मुख्यधारा की शिक्षा प्रणाली से जोड़ा जाएगा।इस फैसले का उत्तराखंड मदरसा शिक्षा बोर्ड के अध्यक्ष मुफ्ती शमून कासमी ने स्वागत किया है। उन्होंने सरकार के निर्णय को ऐतिहासिक बताते हुए कहा कि इससे न केवल मुस्लिम समुदाय बल्कि राज्य के सभी छह अल्पसंख्यक समुदायों के बच्चों को गुणवत्तापूर्ण और आधुनिक शिक्षा का लाभ मिलेगा।मुफ्ती शमून कासमी ने कहा कि इस नई व्यवस्था से मदरसों में पढ़ने वाले बच्चों के लिए भी आईएएस, पीसीएस सहित अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं के रास्ते खुलेंगे। अब मदरसा शिक्षा केवल धार्मिक ज्ञान तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि छात्र मुख्यधारा की शिक्षा से जुड़कर प्रदेश, देश और अपने परिवार का नाम रोशन कर सकेंगे।शिक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि राज्य अल्पसंख्यक शिक्षा प्राधिकरण के गठन से पाठ्यक्रम, शिक्षकों की योग्यता, अधोसंरचना और शैक्षिक निगरानी में सुधार होगा। इससे अल्पसंख्यक संस्थानों में पढ़ने वाले छात्रों को भी समान अवसर और प्रतिस्पर्धी माहौल मिल सकेगा।सरकार का यह कदम अल्पसंख्यक शिक्षा को आधुनिक, समावेशी और रोजगारोन्मुख बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल माना जा रहा है।
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