नंदा देवी बड़ी जात को लेकर चमोली के गांवों में लौटी रौनक, प्रवासियों की घर वापसी शुरू

गोपेश्वर। नंदा देवी बड़ी जात की शुरुआत की तारीख जैसे-जैसे नजदीक आ रही है, वैसे-वैसे चमोली जिले में यात्रा मार्ग से जुड़े गांवों में धार्मिक उत्साह और चहल-पहल बढ़ने लगी है। लोक देवी मां नंदा की पूजा-अर्चना और बड़ी जात में सहभागिता के लिए प्रवासी ग्रामीण बड़ी संख्या में अपने पैतृक गांवों की ओर लौटने लगे हैं, वहीं यात्रा मार्ग की साफ-सफाई, घरों की रंगाई-पुताई और श्रद्धालुओं के स्वागत की तैयारियां भी तेज हो गई हैं। 12 वर्ष में आयोजित होने वाली नंदा देवी बड़ी जात पांच सितंबर को सिद्धपीठ कुरुड़ से विधिवत शुरू होगी। नंदा देवी की यह धार्मिक यात्रा अपनी सदियों पुरानी परंपराओं और हक-हकूकधारियों की महत्वपूर्ण भूमिका के लिए विशेष पहचान रखती है। परंपरा के अनुसार यात्रा के दौरान मां नंदा की डोली को एक गांव से दूसरे गांव तक पहुंचाने की जिम्मेदारी संबंधित गांव के हक-हकूकधारी ग्रामीण निभाते हैं और जिस गांव में डोली पहुंचती है, वहां के ग्रामीण श्रद्धा के साथ उसे अगले पड़ाव तक विदा करते हैं। इस तरह कुरुड़ से शुरू होने वाली यात्रा के आगे बढ़ने के साथ श्रद्धालुओं का कारवां भी लगातार बड़ा होता जाता है। यात्रा के आठवें पड़ाव रामणी के बाद मां नंदा की डोली को आगे ले जाने और वापसी तक उसकी जिम्मेदारी रामणी के ग्रामीणों की होगी। यात्रा में शामिल श्रद्धालुओं के भोजन और ठहरने की व्यवस्था भी परंपरानुसार हक-हकूकधारी ग्रामीणों द्वारा की जाती है, जिसके लिए गांवों में व्यवस्थाएं जुटाने का काम शुरू हो चुका है। यात्रा मार्ग से लगे गांवों में इन दिनों मां नंदा की जात को लोक उत्सव के रूप में मनाने के लिए विशेष तैयारियां चल रही हैं। ग्रामीण अपने घरों की रंगाई-पुताई कर रहे हैं, रास्तों की सफाई की जा रही है और व्यवस्था समितियां श्रद्धालुओं के ठहरने तथा भोजन सहित अन्य जरूरी सुविधाओं को अंतिम रूप देने में जुटी हैं। लंबे समय से गांवों से बाहर रह रहे धियाणियों और प्रवासी ग्रामीणों की भी घर वापसी शुरू हो गई है, जिससे यात्रा मार्ग के गांवों में एक बार फिर उत्सव जैसा माहौल दिखाई देने लगा है। नंदा देवी की यह यात्रा धार्मिक आस्था के साथ-साथ पहाड़ की लोक संस्कृति और सामुदायिक परंपराओं का भी बड़ा प्रतीक मानी जाती है और इसी कारण इसे हिमालयी महाकुंभ के रूप में भी जाना जाता है। बड़ी जात के दौरान सबसे कठिन चुनौती निर्जन पड़ावों पर डोली को पहुंचाने की होती है। यात्रा में आने वाले पांच निर्जन पड़ावों में वाण से आगे मां नंदा की डोली को ले जाने की व्यवस्था भी परंपरा के अनुसार रामणी के ग्रामीण ही करते हैं। यात्रा के प्रमुख पड़ाव नंदानगर के रामणी गांव में पहुंचने पर मां नंदा के साथ दशोली बंड की डोली, भगवान बदरी विशाल की छंतोली, लाता की नंदा, कोट कंडारा-दशोली पट्टी दशमद्वार की डोली समेत विभिन्न देव डोलियों और छंतोलियों का मां नंदा से मिलन होता है, जो यात्रा का महत्वपूर्ण धार्मिक और सांस्कृतिक पड़ाव माना जाता है। रामणी से बड़ी जात 13 सितंबर को अगले पड़ाव के लिए रवाना होगी और इसके बाद वापसी तक मां नंदा की डोली को रामणी के ग्रामीण ही परंपरा के अनुसार आगे ले जाएंगे। रामणी में बड़ी जात के आयोजन को लेकर तैयारियां लगभग पूरी कर ली गई हैं। देव डोलियों के रामणी पहुंचने के अवसर पर 11 सितंबर से तीन दिवसीय श्री नंदा देवी रामणी लोक सांस्कृतिक पर्यटन विकास मेले का भी आयोजन किया जाएगा। मेला आयोजन समिति के अध्यक्ष सूरज पंवार के नेतृत्व में ग्रामीणों ने जिलाधिकारी और पुलिस अधीक्षक से मुलाकात कर यात्रा तथा मेले की व्यवस्थाओं को लेकर चर्चा की है। तीन दिवसीय मेले का समापन 13 सितंबर को बड़ी जात के अगले पड़ाव की ओर रवाना होने के साथ होगा। बड़ी जात को लेकर गांवों में बढ़ती तैयारियों और प्रवासियों की वापसी से पूरे यात्रा मार्ग पर धार्मिक आस्था, लोक संस्कृति और उत्सव का माहौल बनता जा रहा है।

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संपादक : एफ यू खान

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